Anshvali kumar classes
हिन्दी व्याकरण
Class-10th & 12th
*वर्णो का उच्चारण स्थान *
बलाघात – किसी शब्द के उच्चारण में किसी अक्षर पर जो बल दिया जाता है, वह बलाघात कहलाता है। जैसे करण, कमल में क्रमशः ‘क’ तथा ‘म’ पर बल दिया जाता है। अतः, ‘र’ तथा ‘म’ पर बलाघात है। कभी-कभी पूरे शब्द पर भी बलाघात होता है।
*संज्ञा *
प्रश्न 1. संज्ञा की परिभाषा देते हुए कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर ⇒ किसी व्यक्ति, वस्तु , स्थान, भाव आदि के नामों को ‘संज्ञा’ कहते हैं । जैसे- पत्थर, मनुष्य, मूर्खता, राम, सेना आदि।
प्रश्न 2. संज्ञा के कितने भेद होते हैं ? स्पष्ट कीजिए।अथवा, संज्ञा के भेदों को उदाहरण सहित लिखें।
उत्तर ⇒ संज्ञा के मुख्यत: पांच भेद मुख्य होते हैं-
(i) व्यक्तिवाचक संज्ञा – मोहन, हिमालय, गंगा, लखनऊ आदि ।
(ii) जातिवाचक संज्ञा – लड़का, पहाड़, नदी, नगर आदि ।
(iii) भाववाचक संज्ञा – बचपन, सुन्दरता, प्रेम, योग्यता आदि ।
(iv) द्रव्यवाचक संज्ञा – सोना, चाँदी, लकड़ी, अन्न आदि ।
(v) समूहवाचक संज्ञा – सेना, पुलिस, मंत्रिमंडल, सभा आदि ।
*व्यक्तिवाचक संज्ञाओं में निम्नलिखित नाम समाविष्ट होते हैं –
(क) व्यक्तियों के नाम – तुलसीदास, महेश, राम आदि ।
(ख) नदियों के नाम – गंगा, गंडक, यमुना आदि ।
(ग) झीलों के नाम – डल, बैकाल आदि।
(घ) समुद्रों के नाम – प्रशान्त महासागर, हिन्द महासागर आदि ।
(ङ) पहाड़ों के नाम – आल्प्स, विन्ध्य, हिमालय आदि ।
(च) गाँवों के नाम – पैनाल, मनिअप्पा, बिस्पी आदि ।
(छ) नगरों के नाम – जमशेदपुर, पटना, राँची आदि।
(ज) सड़कों, दुकानों, प्रकाशनों आदि के नाम – अशोक राजपथ , परिधान भारती बुक डिपो आदि ।
(झ) महादेशों के नाम – एशिया, यूरोप. आदि।
(ञ) देशों के नाम – चीन, भारतवर्ष, रूस आदि ।
(ट) राज्यों के नाम – उड़ीसा, बिहार, महाराष्ट्र आदि।
(ठ) पुस्तकों के नाम – रामचरितमानस, सूरसागर आदि ।
(ड) पत्र-पत्रिकाओं के नाम – दिनमान, अवकाश-जगत् आदि ।
(ढ) त्योहारों, एतिहासिक घटनाओं के नाम – गणतंत्र-दिवस साल
(ण) ग्रह-नक्षत्रों के नाम – चंद्र, रोहिणी, सूर्य आदि।
(त) महीनों के नाम – आश्विन, कार्तिक, जनवरी आदि ।
(थ) दिनों के नाम – सोमवार, मंगलवार, बुधवार आदि ।
*जातिवाचक संज्ञाओं में निम्नलिखित समाविष्ट होते हैं –
(क) पशुओं, पक्षियों एवं कीट-पतंगों के नाम – खटमल, गाय, घोड़ा, चील,मैना आदि।
(ख) फलों, सब्जियों तथा फूलों के नाम – आम, केला, परवल, पालक, जूही आदि।
(ग) पहनने, ओढ़ने, बिछाने आदि के सामान – कुर्ता, जूता, तकिया, तोशक, धोती, साड़ी आदि।
(घ) अन्न, मसाले, मिठाई आदि पदार्थों के नाम – गेहूँ, चावल, जलेबी, तेजपात, रसगुल्ला आदि।
*भाववाचक संज्ञा में निम्नलिखित समाविष्ट होते हैं –
(क) गुण – कुशाग्रता, चतुराई, सौन्दर्य, आदि ।
(ख) भाव – कृपणता, पित्रता, शत्रुता आदि ।
(ग) अवस्था – जवानी, बचपन, बुढ़ापा आदि ।
(घ) माप – ऊँचाई, चौड़ाई, लम्बाई आदि।
(ङ) क्रिया – दौड़धूप, पढ़ाई, लिखाई आदि ।
(च) गति – फुर्ती, शीघ्रता, सुस्ती आदि ।
(छ) स्वाद – कड़वापन, कसैलापन, तितास, मिठास आदि ।
(ज) अमूर्त भावनाएँ – करुणा, क्षोभ, दया आदि।
*वचन *
प्रश्न-वचन किसे कहते हैं ? उसके कितने भेद हैं ?
उत्तर⇒ व्याकरण में ‘वचन’ संख्या-बोध के लिए प्रयुक्त होता है। शब्द से उसके एक या अनेक होने का बोध वचन है।
हिन्दी भाषा में दो वचन हैं — एकवचन और बहुवचन ।
एकवचन – शब्द के जिस रूप से एक वस्तु या एक व्यक्ति का बोध हो, उसे एकवचन कहते हैं । जैसे- घोड़ा, कन्या, नदी, नारी, पुस्तक आदि।
बहुवचन – शब्द के जिस रूप से एक से अधिक व्यक्तियों या वस्तुओं का बोध हो, उसे बहुवचन कहते हैं । जैसे— घोड़े, कन्याएँ, नदियाँ, पुस्तकें आदि।
*लिंग *
प्रश्न – लिंग किसे कहते हैं ? उसके कितने भेद हैं ?
उत्तर⇒ लिंग संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘चिह्न’ या निशान । जिन चिह्नों से शब्दों का स्त्रीवाचक या पुरुषवाचक होना प्रकट हो, उन्हें लिंग कहते हैं।हिन्दी भाषा में दो लिंग होते हैं –(i) पुंलिंग, (ii) स्त्रीलिंग ।
(i) पुंलिंग – पुरुषत्व का बोध कराने वाले शब्दों या चिह्नों को पुंलिंग कहते हैं। जैसे- पिता, घोड़ा।(ii) स्त्रीलिंग-स्त्री जाति का बोध करानेवाले शब्दों को स्त्रीलिंग कहते हैं; . जैसे— गायिका।
प्रश्न-पुंलिंग से स्त्रीलिंग बनाने के नियम बताएँ।
उत्तर⇒ पुंलिंग से स्त्रीलिंग बनाने के नियम – जिन प्रत्ययों के योग से पुंलिंग शब्द स्त्रीलिंग में बदल जाते हैं, उन्हें स्त्रीवाची प्रत्यय कहते हैं। हिन्दी में मुख्य स्त्री प्रत्यय हैं – आ, ई, नी, आनी, आइन, इनी, इका, इया, इन, वती, मती । इन प्रत्ययों का प्रयोग करते समय मूल शब्द के अन्तिम स्वर को हटा दिया जाता है। कई बार मूल शब्द का मूलतः ही परिवर्तन हो जाता है। प्रत्ययों के . योग से बने स्त्रीलिंग शब्दों के कुछ रूप आगे दिए जा रहे हैं –
*सर्वनाम *
सर्वनाम;-‘सर्वनाम’ का शाब्दिक अर्थ है-‘सबका नाम’ । व्याकरण में ‘सर्वनाम’ ऐसे शब्दों को कहते हैं जिनका प्रयोग सब प्रकार के नामों के लिए हो सके । दूसरे शब्दों में, जो शब्द संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होते हैं, उन्हें सर्वनाम’ कहते हैं । जैसे— मैं, तू, आप, वह आदि।
(i) पुरुषवाचक सर्वनाम- जो ‘सर्वनाम’ पुरुषवाचक या स्त्रीवाचक ‘संज्ञाओं के नाम के बदले में आता है, उसे पुरुषवाचक सर्वनाम कहा जाता है । जैसे— मैं, हम, तुम, बह, आदि ।
पुरुषवाचक सर्वनाम के तीन भेद हैं-
(क) प्रथम पुरुष – ‘प्रथम पुरुष’ को उत्तम पुरुष भी कहा जाता है। जिस ‘सर्वनाम’ का प्रयोग कहने या बोलने वाला अपने लिए करता है. उसे प्रथम पुरुष कहा जाता है। जैसे- मैं, हम ।
(ख) मध्यम पुरुष – सुनने वाले के लिए जिस ‘सर्वनाम’ का प्रयोग किया जाता है, उसे मध्यम पुरुष कहा जाता है । जैसे- तू, तुम, आप, तुम्हें, आपको आदि ।
(ग) अन्य पुरुष- जिस ‘सर्वनाम’ का प्रयोग ऐसी ‘संज्ञा’ के लिए हो, जिसके विषय में बात की जा रही हो, किन्तु जो वहाँ उपस्थित न हो, ऐसे ‘सर्वनाम’ को अन्य पुरुष कहा जाता है । जैसे— वह, वे, उसकी, उनकी, उसका आदि।
(ii) निश्चयवाचक सर्वनाम – जिससे ‘निश्चित’ व्यक्ति, वस्तु या भाव का बोध हो, उसे निश्चयवाचक सर्वनाम कहा जाता है । जैसे- यह, वह, ये, वे,आप आदि।
(iii) अनिश्चयवाचक सर्वनाम- जिससे किसी ‘निश्चित’ व्यक्ति, वस्तु या भाव का बोध न हो, उसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं । जैसे— कोई, कुछ।
(iv) सम्बन्धवाचक सर्वनाम- जिस ‘सर्वनाम’ से वाक्य में आये ‘संज्ञा’ के साथ ‘सम्बन्ध’ स्थापित किया जाय, उसे सम्बन्धवाचक सर्वनाम कहा जाता है । जैसे— जो, सों, जौन, तौन । इस प्रकार के ‘सर्वनाम’ वाक्य में एक-दूसरे के बाद आते हैं। जैसे—जो करेगा, सो भरेगा।
(v) प्रश्नवाचक सर्वनाम- जिस ‘सर्वनाम’ का प्रयोग ‘प्रश्न’ करने के लिए किया जाता है, उसे प्रश्नवाचक सर्वनाम कहा जाता है ।
जैसे— कौन, क्या।
(vi) निजवाचक सर्वनाम- जिस ‘सर्वनाम’ से ‘स्वयं या निज’ का बोध हो, उसे निजवाचक सर्वनाम कहते हैं । जैसे- आप, स्वयं । ‘निजवाचक’ सर्वनाम का प्रयोग ‘वक्ता’ अपने लिए करता है। जैसे मैं स्वयं यह काम करूँगा।
*विशेषण *
प्रश्न 1. विशेषण किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर⇒जो शब्द ‘संज्ञा’ या सर्वनाम की ‘विशेषता’, ‘गुण’ और ‘धर्म’ बताए, ब उसे ‘विशेषण’ कहा जाता है। जैसे-लाल घोड़ा, उजली कमीज, अच्छा लड़काआदि । इन वाक्यों में लाल, उजली, अच्छा शब्द ‘संज्ञा’ की विशेषता बताते हैं । अतः स ये शब्द विशेषण हैं।
प्रश्न 2 . विशेषण के कितने भेद हैं ? सबका सोदाहरण परिचय दें।
उत्तर⇒विशेषण के सामान्यतया चार भेद माने जाते हैं-
(i) गुणवाचक विशेषण
(ii) परिमाणवाचक विशेषण
(iii) संख्यावाचक विशेषण
(iv) सार्वनामिक विशेषण
(i) गुणवाचक विशेषण – संज्ञा या सर्वनाम के गुण, दोष, रूप, रंग, आकार, प्रकार, स्थान, काल, दशा, स्थिति, शील, स्वभाव, स्वाद, गंध आदि का बोध कराने वाले शब्द. गुणवाचक विशेषण कहलाते हैं। उदाहरण –
सरल, भला, कुशल, उचित, पवित्र, साफ (गुण)।
कुटिल, जटिल, बुरा, लचर, अनुचित, गन्दा (दोष)।
गोल, चौकोर, तिकोना, लंबा, चौड़ा, ठिगना (आकार)।
लाल, पीला, नीला, मैला, उजला, गोरा (रंग)।
(ii) परिमाणवाचक विशेषण – जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की माप-तौल, परिमाण को प्रकट करते हैं, परिमाणवाचक विशेषण कहलाते हैं।
परिमाणवाचक विशेष दो प्रकार के होते हैं-
(क) निश्चित परिमाणवाचक विशेषण — किसी संज्ञा या सर्वनाम के निश्चित परिमाण का बोध कराते हैं, वे निश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं। जैसे चार लिटर दूध, एक क्विंटल गेहूँ, दस मीटर कपड़ा, दस ग्राम सोना । कभी-कभी बाद में ‘भर’ लगाने से भी निश्चित परिमाण का बोध होता है। जैसे—सेर भर ।
(ख) अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण – जिन विशेषणों से संज्ञा या । सर्वनाम के निश्चित परिमाण का ज्ञान न होकर अनिश्चित माप-तौल का ज्ञान हो, उन्हें अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं । जैसे—कुछ, बहुत, अधिक, थोड़ा, 1 तनिक, इतना, उतना, जितना, कितना, ढेर, सारा आदि । कभी-कभी इनके साथ सा-से-सी का प्रयोग भी कर दिया जाता है। जैसे-थोड़ा-सा।
(iii) संख्यावाचक विशेषण—जिस विशेषण से संज्ञा या सर्वनाम की संख्या का ज्ञान हो, उसे संख्यावाचक विशेषण कहते हैं। चार घोड़े दौड़ते हैं; दस विद्यार्थी पढते हैं वाक्यों में ‘चार’ और ‘दस’ संख्यावाचक विशेषण हैं, क्योंकि इनसे ‘घोड़े’ तथा विद्यार्थी’ की संख्या-सम्बन्धी विशेषता का ज्ञान होता है।
संख्यावाचक विशेषण के दो भेद हैं
(क) निश्चित संख्यावाचक और (ख) अनिश्चित संख्यावाचक।
(क) निश्चित संख्यावाचक – जिस विशेषण से किसी निश्चित संख्या का बोध हो उसे निश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं। जैसे-चार लडके।
(ख)अनिश्चित संख्यावाचक – अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण से संख्या का निश्चय कछ भी नहीं हो, उसे अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं। जैसे – थोडे लोग, कुछ लोग। बहुत-से विशेषण ऐसे भी होते हैं, जो संया परिमाणवाचक दोनों ही रूपों में प्रयुक्त होते हैं; जैसे- कुछ, सब. थोडा आदि
संख्यावाचक – कुछ रोटियाँ, सब आम ।
परिमाणवाचक – कुछ दूध, सब आटा।
(iv) सार्वनामिक विशेषण – जो ‘सर्वनाम’ शब्द ‘संज्ञा’ से पहले आकर ‘विशेषण’ का काम करते हैं, उन्हें सार्वनामिक विशेषण कहा जाता है। जैसे—यह बालक, वह विद्यालय, उस फकीर ने आदि।
*कारक *
कारक – जो क्रिया की उत्पत्ति में सहायक हो, उसे कारक कहा जाता है।जैसे – ‘कृष्ण ने पाण्डवों से कौरवों का नाश करवा दिया।
कारक के मुख्य भेद छः माने जाते हैं-
कर्ता कारक – क्रिया के करने वाले को कर्त्ता कहते हैं । अतः, शब्द के जिस रूप से क्रिया करने वाले का पता चले, उसे कर्त्ता कारक कहते हैं । जैसे—लड़का खेल रहा है। सूर्य चमकता है।
कर्म कारक – जिस पदार्थ पर कर्त्ता की क्रिया का फल पड़े, उसे कर्म कारक कहते हैं। जैसे ‘राम ने श्याम को पीटा’ इस वाक्य में कर्ता ‘राम’ की क्रिया ‘पीटना’ का फल श्याम पर पड़ता है अर्थात् यहाँ श्याम पीटा जाता है, अतः ‘श्याम’ को कर्म कहा जायेगा।
करण कारक – करण साधनरूप कारक होता है। अतः, जिस शब्द की सहायता से क्रिया का पार होता है, उसे करण कारक कहते हैं। इसकी विभक्ति ‘से’, ‘द्वारा’, ‘के द्वारा’ या ‘के साथ’ है। जैसे मोहन चाकु से फल काट रहा है। मोहन ने यह किताब नौकर द्वारा भिजवाई है।
सम्प्रदान कारक – जिसके लिए क्रिया की जाती है या जिसे कुछ दिया जाता है, उसे संप्रदान कारक कहते हैं। संप्रदान के परसर्ग हैं के लिए, के वास्ते, के हेतु, को आदि । जैसे—राम ने राजीव को गाय दी । इस वाक्य में ‘राजीव को’ सम्प्रदान कारक है, क्योंकि गाय उसे ही दी गयी है।
अपादान कारक – संज्ञा तथा सर्वनाम के जिस रूप से उससे किसी का अलग होना, डरना, उत्पन्न होना आदि पता चले, उसे अपादान कारक कहते हैं। जैसे वृक्ष से पत्ता गिरता है। यहाँ ‘वृक्ष से’ अपादान कारक है। हम लखनऊ से आए हैं।
सम्बन्ध कारक – जिस संज्ञा या सर्वनाम से किसी दूसरे शब्द का सम्बन्ध या लगाव जान पड़े, उसे सम्बन्ध कारक कहते हैं। जैसे राम की गाय चरती है। यहाँ ‘राम की गाय’ में ‘गाय’ का सम्बन्ध ‘राम’ से है, अतः ‘राम की’ को सम्बन्ध कारक कहा जायेगा।
अधिकरण कारक – क्रिया या आधार को सूचित करनेवाली संज्ञा या सर्वनाम के स्वरूप को अधिकरण कारक कहते हैं।
(i).कभी-कभी ‘में’ के अर्थ में ‘पर’ और ‘पर’ के अर्थ में ‘में’ का प्रयोग होता हैं। जैसे तुम्हारे घर पर चार आदमी हैं घर में । दूकान पर कोई नहीं था = दूकान में । नाव जल में तैरती है—जल पर ।
(ii). कभी-कभी अधिकरण कारक की विभक्तियों का लोप भी हो जाता है। – जैसे वह संध्या समय गंगा-किनारे जाता है।
सम्बोधन कारक – संज्ञा के जिस रूप से किसी को बुलाया, पुकारा. या सम्बोधित किया जाए, उसे सम्बोधन कारक कहते हैं। जैसे हे प्रभु ! मेरा उद्धार करो। यहाँ ‘हे प्रभु !’ सम्बोधन कारक है।
Q कारक के भेद भेदों का नाम चिन्ह सहित लिखे ?
*संधि*
प्रश्न 1. संधि किसे कहते हैं ?
उत्तर⇒ संधि शब्द का अर्थ है मेल। जब दो शब्द एक-दूसरे से मिलते हैं तो उनके मिलने के कारण ध्वनियों में जो परिवर्तन होता है, उसे संधि कहते हैं।
प्रश्न 2. संधि के कितने भेद हैं ? प्रत्येक के दो-दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर⇒संधि के तीन भेद होते हैं
1.स्वर संधि – जहाँ एक स्वर का दूसरे स्वर से मेल होने पर जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं। जैसे-विद्या + अर्थी = विद्यार्थी, रवि + इंद्र = रवींद्र
आदि।
2. व्यंजन संधि – व्यंजन ध्वनि से परे स्वर या व्यंजन आने से व्यंजन में जो विकार (परिवर्तन) आता है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं। जैसे–दिक् + अंबर = दिगंबर, सत् + जन = सज्जन आदि।
3.विसर्ग संधि – विसर्ग के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में जो विकार होता है, उसे विसर्ग संधि कहते हैं। जैसे–नमः + ते = नमस्ते, मनः + बल = मनोबल
आदि।
प्रश्न 3. स्वर संधि के कितने भेद हैं ? उदाहरण सहित लिखें।
उत्तर⇒जहाँ एक स्वर का दूसरे स्वर से मेल होने पर जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं। जैसे-विद्या + अर्थी = विद्यार्थी, रवि + इंद्र = रवींद आदि।
स्वर संधि के चार भेद हैं-
1. दीर्घ संधि – ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ से परे क्रमशः ह्रस्व या दीर्घ अ / इ । उ./ आ जाएँ तो दोनों मिलकर क्रमशः दीर्घ आ, ई, ऊ हो जाते हैं।
जैसे-मत + अनुसार = मतानुसार; गिरि + ईश = गिरीश आदि।
2.गुण संधि – यदि ‘अ’ और ‘आ’ के आगे ‘इ’ या ‘ई’, ‘उ’ या ‘ऊ’, ‘ऋ’ या ‘ऋ’ आते हैं, तो दोनों के मिलने से क्रमशः ‘ए’, ‘ओ’ और ‘अर्’ हो जाते हैं। जैसे–महा + उत्सव = महोत्सव, नर + ईश = नरेश आदि।
3. वृद्धि संधि – ‘अ’ या ‘आ’ से परे ‘ए’ या ‘ऐ’ हों तो दोनों मिलकर ‘ऐ’ और ‘ओ’ या ‘औ’ हों तो दोनों मिलकर ‘औ’ हो जाते हैं।जैसे-सदा + एव = सदैव, मत + ऐक्य = मतैक्य आदि।
4. यण संधि – यदि इ, ई, उ, ऊ और ऋ के बाद भिन्न स्वर आए तो इाई – का ‘य’, उ/ऊ का ‘व्’ और ऋ का ‘र’ हो जाता है।जैसे-सु + आगत = स्वागत, अति + अधिक = अत्यधिक आदि।
*समास *
परिभाषा — दो अथवा दो से अधिक शब्दों के मिलने पर जो एक नया स्वतंत्र पद बनता है, उसे समस्तपद तथा इस प्रक्रिया को समास कहते हैं। समास होने पर बीच की विभक्तियों, शब्दों तथा ‘और’ आदि अव्ययों का लोप हो जाता है।
समास निम्नलिखित छः प्रकार के होते हैं –
द्वंद्व समास:-जिस समास के दोनों पद प्रधान होते हैं, उसे द्वंद्व समास कहते हैं। इस समास के विग्रह में बीच में और, तथा; अथवा, या आदि योजक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। यथा – समस्तपद – माता-पिता, विग्रह-माता और पिता आदि।
द्विगु समास:- जिस समस्तपद में पहला पद संख्यावाचक विशेषण हो अथवा जो किसी समुदाय की सूचना देता हो, वह द्विगु समास कहलाता है। जैसे –पंचवटी-पाँच वटों का समूह,त्रिलोक -तीन लोकों का समूह
कर्मधारय समास:- जिस समस्तपद के खण्ड विशेष्य-विशेषण अथवा उपमान उपमेय होते हैं, उसे कर्मधारय समास कहते हैं। यथा –चन्द्रमुखी = चन्द्र (उपमान) + मुख (उपमेय),लालमिर्च = लाल (विशेषण) + मिर्च (विशेष्य)
तत्पुरुष समास :-जिस समस्तपद में दूसरा पद प्रधान हो और प्रथम पद के कारक-चिह्न का लोप हो उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। यथा –राजकन्या-राजा की कन्या,जलमग्न -जल में मग्न
अव्ययीभाव समास;- जिस समास में प्रथम (पूर्व) पद अव्यय हो और जो उत्तरपद के साथ जुड़कर पूरे पद को अव्यय बना दे, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। यथा-आमरण-मरणपर्यंत, प्रतिदिन -दिन-दिन
बहुव्रीहि समास;- जिस समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता है, वरन् दोनों ही पद किसी अन्य संज्ञा-शब्द के विशेषण होते हैं, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। यथा –दशानन-दश हैं आनन जिसके अर्थात् रावण,त्रिलोचन -त्रि (तीन) हैं लोचन (नेत्र) जिसके अर्थात् शिव.
*शब्द*
शब्द – भाषा की लघुतम सार्थक इकाई को शब्द कहते हैं। जैसे-घर। स्रोत या . उद्गम(उत्पति ) के आधार पर शब्द चार प्रकार के होते हैं, यथा-
(i) तत्सम – संस्कृत के मूल शब्द को तत्सम शब्द कहते हैं, जैसे-अश्रु, कर्पूर, कपाट आदि।
(ii) तद्भव – संस्कृत शब्दों के बदले रूप तद्भव शब्द कहलाते हैं। जैसे-आँसू, कपूर, किवाड़ आदि।
(iii) देशज – देशी भाषाओं के शब्द देशज कहलाते हैं। जैसे-लोटा, डिबिया, खटिया आदि।
(iv) विदेशज – विदेशी भाषाओं के शब्द विदेशज कहलाते हैं। जैसे-स्टेशन, इंजीनियर, रिक्शा (जापानी), चाय, लीची (चीनी) आदि।
*बनावट की दृष्टि से शब्दो के भेद :
(i) रूढ़ – जिन शब्दों को खंडित करने पर उसका कोई अर्थ न निकलता हो। जैसे-पानी अर्थात् जल। लेकिन ‘पा’ और ‘नी’ को अलग करने पर कोई अर्थ नहीं प्राप्त होता है।
(ii) यौगिक – जिन शब्दों को खंडित करने पर उसका अर्थ निकलता हो। जैसे-विद्यालय-विद्या + आलय (दोनों का अपना-अपना अर्थ है)।
(iii) योगरूढ़ि – जिन शब्दों का अर्थ सार्थक होने पर भी विशेष अर्थ निकलता हो। जैसे-पंकज अर्थात् पंक + ज (पंक-कीचड़ और ‘ज’ जन्म लेनेवाला)। लेकिन इसका विशेष अर्थ ‘कमल’ होता है।
*अंतर सम्बन्धी *
प्रश्न 1. बोली और भाषा में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर⇒ साधारण जनता जिसको स्थानीय स्तर पर समझती बोलती है, उसे बोली कहते हैं। जैसे- वज्जिका, मैथिली, मगही और भोजपुरी आदि। भाषा संस्कृत के ‘भाष’ धातु से निर्मित है। जिसका मतलब है वाणी की अभिव्यक्ति। अर्थात् भाषा के माध्यम से कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को, अपने मन की अभिव्यक्ति समझता है या उसकी अभिव्यक्ति समझ लेता है। जैसे- भाषा के रूप में अंग्रेजी, लैटिन, हिन्दी, उर्दू, चाईनीज आदि।
प्रश्न 2. उपसर्ग एवं प्रत्यय में क्या अंतर है? सोदाहरण लिखें।उत्तर⇒उपसर्ग शब्द के प्रारंभ में जुड़कर यौगिक शब्द बनाते हैं । इनके प्रयोग से उनके अर्थ में विशेषता आ जाती है। जैसे-सु-सुपुत्र, सत्-सज्जन । यह वह शब्दांश है जो किसी शब्द के अन्त में जोड़ा जाता है; जैसे-गानेवाला कारक। इनमें क्रमशः ‘वाला’ और ‘अक’ प्रत्यय लगा हुआ है।
प्रश्न 3. कर्मधारय समास और बहुव्रीहि समास में अन्तर स्पष्ट करें।उत्तर⇒कर्मधारय समास में समस्त पद में एक पद दूसरे पद का विशेषण या उपमान होता है। जैसे-‘नीलांबर’ (नीला है जो आकाश) अर्थात् नीले रंग का अथवा ‘देहलता’ (देहरूपी लता) में ‘लता’ पद ‘देह’ पद का उपमान है। बहुव्रीहि समास के दोनों पद किसी अन्य (संज्ञा आदि) पद के द्योतक होते हैं और इनका अर्थ शब्द-खंडों के अर्थ से सर्वथा भिन्न होता है.। जैसे-‘वज्रांगी’ वज्र के समान अंग हैं जिसके अर्थात् हनुमान । यहाँ ‘वज्र’ पद ‘अंगी’ पद का विशेषण न होकर दोनों ही पद अन्य संज्ञा शब्द (हनुमान) के विशेषण हैं।
प्रश्न 4. संधि और समास में अन्तर क्या अंतर है? सोदाहरण लिखें।
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